Sunday, 30 November 2014

संस्कृत बनाम जर्मनी


     एक नया विवाद उठ खड़ा  हुआ है कैन्द्रीय शिक्षा  पाठ्यकृम मे ! जर्मनी भाषा को निकाल  संस्कृत  को  रोपने   का । एक  तीर आकर  लगा अचानक केवीएस में अध्ययन करते  छात्रों पर मानव संसाधन मत्रालय के लिये इस निर्णय का कि अब केवीइस के 1100 में से 500 स्कूलों में वैकल्पिक पाठ्यक्रम के रूप में ली गई जर्मन भाषा के 70000 छात्रों को  भाषा की जगह संस्कृत भाषा पढ़नी होगी ।

           पिछले 15 सालों के इतिहास में देखे तो सबसे ज्यादा विदेश यात्रा करने वाले प्रधान मंत्री मोदी जी  ही है वर्तमान में विदेश नीति की जो छबि उन्होने देश  वासियों को दिखाई इसे अब देश में नजीर की तरह पेश भी किया जाने लगा है । वैश्वीकृत होती इस दुनियां में धुरी बनने का प्रयास करते  मोदी जी विज्ञान  और  विकास कोअपने दोनों चौड़े कंधों पर शोभित कर  विश्व परिक्रमां  में लगे हुये हैं पर  संध की सोच उत्तरभारत तक ही अटकी नजर आती है । इस संस्कृत बनाम जर्मन भाषा पर उठे विवाद पर मोदी जी ने आपत्ति तो क्या हल्का सा विरोध भी नहीं  जताया ।  आश्चर्य है  दुनियां के सामने  वैश्वीकृत छवि धारण करने वाला यह चरित्र अपने घर के अंदर  रूढ़िवादी है । सो मानव संसाधन  विभाग  से ये फरमान जारी  करने में ज्यादा कुछ दिक्कते नही आई की भविष्य में केन्द्रीय  विघायालयों में  अतिरिक्त  विषय के रूप में  जर्मनी  नही अब संस्कृत का  पठन  होगा ।
          अच्छा है संस्कृत भाषा हमारी विरासत है यह हमारे लिये तो मान सम्मान का विषय हो सकता है पर सोचना यह है कि आज के समय इसकी प्रायोगिकता कितनी है ? न तो इसे विज्ञान से जोड़ा जा सकता और न ही इस दौर के व्यापारीकरण से । भारत को छोड़ दुनियां के कितने देश या कितने लोग इस भाषा का प्रयोग करते है या यो कहे इस भाषा के बारे में जानते भी हैं ? शादी ब्हाय, पूजा पाठ और धर्मध्यान से आगे तो इस भाषा की बढ़त हमारे खुद के देश में भी नही है ।
           इस फैसले पर यदि सिर्फ जर्मनी नजर तिरछी करता तो उसे सहा भी जा सकता था पर वो हजारों-हजार जर्मन भाषा की शिक्षा लेते विद्यार्थी जो पीछे इसमें दाखिला ले चुके हैं उनके भविष्य का क्या ? संध यदि संस्कृत लाना ही चाह रहा था तो लाता पर जर्मनी भाषा को हटाकर ही क्यों ? होना तो यह चाहिये था कि वैश्वीकृत होती इस दुनियां में संस्कृत तो क्या फ्रेन्च, लेटिन रशियन या दुनियां की भिन्न भाषाओं के पठन पाठन का विकल्प बच्चों को दिया जाना चाहिये था हां उसमे यदि संस्कृत वैकल्पिक विषय के रूप में प्रस्तुत की जाती तो इससे उसका मान सम्मान कही से भी कम नही होने वाला था, और यह पहल मोदी जी करते तब ही उन्हें विश्वदृष्टा कहा जा सकता था ।
             विश्वबंधुता की बात करें तो उनकी अपनी भाषा में उनसे किया गया संवाद अंदर तक पहुच उनके बीच हमारे आने जाने का रास्ता बनाता है और यही वाणिज्यिक क्षमता हमारे देश को, देश के लोगों को उनके बीच स्थापित कर भीतर तक पहुच बना सकती है । महज संध प्रवर्तन को दर्शाने इस अदूरदर्शी आदेश को देश पर मढ़ देना उचित नही है । कोई भी खतरनाक खेल जाली के भीतर खेला जाता है शूटिंग रेंज जनविहीन स्थान पर बनई जाती है इसके पीछे उद्धेश्य यह होता है कि लोगे को इससे नुकसान न हो पर संध विचारधारा को प्रतिष्ठित एवं प्रमाणित करने के लिये शिक्षा और इससे जुड़े हजारों बच्चों को वालंटियर जैसा उपयोग कर क्यों उनका भविष्य दाव पर लगाया जा रहा है यह चिंता का विषय है । सबसे ज्यादा दुख तो यह है कि संध विचारधारा का प्रवर्तन कर रहे बुद्धिजीवी कहलाने वाले अध्यापकों द्वारा संस्कृत स्थापन का यह विषय उठाया गया ।

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