Sunday, 30 November 2014

रामपाल दरबार: सतलोक आश्रम हिसार..

रामपाल दरबार सतलोक आश्रम हिसार में पिछले तीन दिनों में जो कुछ हुआ वो पूरे देश ने देखा । अब जिस घटनाक्रम का समापन पांच मौतों से हो उसे तमाशा तो नही कहा जा सकता ! गंभीर विषय है ये तो इस पर चिंतन भी गंभीर ही होना चाहिये पर लोगों की अभिव्यक्ति तो मीड़िया के गिर्द ही घूमती है अब वो समय है कि इसपर हटकर ही सोचना होगा ।
ईश्वर भक्ति को कौन गलत कह सकता है, धर्म कोई भी हो मूलधारा में तो ईश्वर हैं पर पंथ में पंथप्रधान को हम ईश्वर से भी बड़ा बना देते हैं । सामाजिक पृष्ठ भूमि में तो लोगों के विषय भी अलग हैं विचार धारायें भी अलग है और इस पर वार्तालाप भी भिन्नता लिये होता है पर पंथ में ऐसा नहीं होता, विषय भी एक है व्यक्ति भी एक है और उसी एक की विचारधारा सभी पंथियों पर समान रूप से हावी होती है । समय गुजरते ईश्वर पीछे छूटता जाता है और पूरे पंथ में पंथ प्रधान उसकी जगह ले लेता है फिर जब अहंकार सिर चढ़कर बोलता है तो परिणाम देश, काल, परिस्थिती बदल कर यही होता है जो पिछले तीन दिनों में हमने हिसार में देखा इस पर विडंम्बना यह कि जो कुछ अच्छा हुआ या बुरा वह पंथियों को अच्छा ही लगता है ।
क्या हो गया है लोगों को ? 21वी सदी के वर्तमान में 18वी सदी का अंधानुकरण, अब हम प्रशासन को दोष दे या सरकार को, हल तो जनता से ही निकलना है जंहा प्रशासन और सरकार को इन पंथों पर नजर रखनी चाहिये वहीं लोगों को भी आंख मूंदकर इन पंथ प्रधानों की अंधभक्ति से बचना चाहिये अन्यथा न तो ये पहला प्रकरण है और न ही यह अंतिम होगा । लोग समझें की मन की शांति के लिये तलाशी जा रही ईश्वरी शरण और मानवनिहित आचरण भक्ति में क्या अंतर है अन्यथा यह चक्र हमेशा यो ही पुनरावृत होता रहेगा ।

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