उस दिन मैने उस फल्ली भूनकर बेचने वाले की बातों पर गौर किया : कितनी मिन्नते शामिल थी उसके आग्रह पर बावूजी रूक जाइये फल्ली गरम भूनकर देता हूं.. उसके चेहरे पर मेरे चले जाने की सोच से बनी मायूसी थी ! क्यों कर रहा था वो ऐसा, ना ही वो उसके लिये मनोरंजन था और ना ही उसका शौक । निश्चत ही ये उसकी वो परिस्थिती थी जो उसे उसका घर चलाने हर दिन ऐसा करने पर मजबूर करती है । अक्सर मैने बंद अव्हान से मची तोड़ फोड़ भाग दौड़ और अफरातफरी के बाद हो रही चर्चाओं में इनसे कुछ मिला या न मिला हो, लोगों को मजे मिलने के बहुत से वार्तालाप संकलित किये हैं पर इस बीच मिन्नत करके फल्ली बेचने वाले उस गरीब का चेहरा हरदम मेरी आंखों के सामने इस प्रश्न के साथ बना रहा की आज इन लोगों को मिला मजा उस पर और उस जैसे कई हजार परिवारों की जिंदगी पर निश्चित ही भारी पड़ रहा होगा ।

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