Sunday, 14 December 2014

हार की जीत 'सुदर्शन की कहानी '

हार की जीत

सुदर्शन की कहानी

 

माँ को अपने बेटे और किसान को अपने लहलहाते खेत देखकर जो आनंद आता है, वही आनंद बाबा भारती को अपना घोड़ा देखकर आता था। भगवद्-भजन से जो समय बचता, वह घोड़े को अर्पण हो जाता। वह घोड़ा बड़ा सुंदर था, बड़ा बलवान। उसके जोड़ का घोड़ा सारे इलाके में न था। बाबा भारती उसे ‘सुल्तान’ कह कर पुकारते, अपने हाथ से खरहरा करते, खुद दाना खिलाते और देख-देखकर प्रसन्न होते थे। उन्होंने रूपया, माल, असबाब, ज़मीन आदि अपना सब-कुछ छोड़ दिया था, यहाँ तक कि उन्हें नगर के जीवन से भी घृणा थी। अब गाँव से बाहर एक छोटे-से मन्दिर में रहते और भगवान का भजन करते थे। “मैं सुलतान के बिना नहीं रह सकूँगा”, उन्हें ऐसी भ्रान्ति सी हो गई थी। वे उसकी चाल पर लट्टू थे। कहते, “ऐसे चलता है जैसे मोर घटा को देखकर नाच रहा हो।” जब तक संध्या समय सुलतान पर चढ़कर आठ-दस मील का चक्कर न लगा लेते, उन्हें चैन न आता।
खड़गसिंह उस इलाके का प्रसिद्ध डाकू था। लोग उसका नाम सुनकर काँपते थे। होते-होते सुल्तान की कीर्ति उसके कानों तक भी पहुँची। उसका हृदय उसे देखने के लिए अधीर हो उठा। वह एक दिन दोपहर के समय बाबा भारती के पास पहुँचा और नमस्कार करके बैठ गया। बाबा भारती ने पूछा, “खडगसिंह, क्या हाल है?”
खडगसिंह ने सिर झुकाकर उत्तर दिया, “आपकी दया है।”
“कहो, इधर कैसे आ गए?”
“सुलतान की चाह खींच लाई।”
“विचित्र जानवर है। देखोगे तो प्रसन्न हो जाओगे।”
“मैंने भी बड़ी प्रशंसा सुनी है।”
“उसकी चाल तुम्हारा मन मोह लेगी!”
“कहते हैं देखने में भी बहुत सुँदर है।”
“क्या कहना! जो उसे एक बार देख लेता है, उसके हृदय पर उसकी छवि अंकित हो जाती है।”
“बहुत दिनों से अभिलाषा थी, आज उपस्थित हो सका हूँ।”
बाबा भारती और खड़गसिंह अस्तबल में पहुँचे। बाबा ने घोड़ा दिखाया घमंड से, खड़गसिंह ने देखा आश्चर्य से। उसने सैंकड़ो घोड़े देखे थे, परन्तु ऐसा बाँका घोड़ा उसकी आँखों से कभी न गुजरा था। सोचने लगा, भाग्य की बात है। ऐसा घोड़ा खड़गसिंह के पास होना चाहिए था। इस साधु को ऐसी चीज़ों से क्या लाभ? कुछ देर तक आश्चर्य से चुपचाप खड़ा रहा। इसके पश्चात् उसके हृदय में हलचल होने लगी। बालकों की-सी अधीरता से बोला, “परंतु बाबाजी, इसकी चाल न देखी तो क्या?”
दूसरे के मुख से सुनने के लिए उनका हृदय अधीर हो गया। घोड़े को खोलकर बाहर गए। घोड़ा वायु-वेग से उडने लगा। उसकी चाल को देखकर खड़गसिंह के हृदय पर साँप लोट गया। वह डाकू था और जो वस्तु उसे पसंद आ जाए उस पर वह अपना अधिकार समझता था। उसके पास बाहुबल था और आदमी भी। जाते-जाते उसने कहा, “बाबाजी, मैं यह घोड़ा आपके पास न रहने दूँगा।”
बाबा भारती डर गए। अब उन्हें रात को नींद न आती। सारी रात अस्तबल की रखवाली में कटने लगी। प्रति क्षण खड़गसिंह का भय लगा रहता, परंतु कई मास बीत गए और वह न आया। यहाँ तक कि बाबा भारती कुछ असावधान हो गए और इस भय को स्वप्न के भय की नाईं मिथ्या समझने लगे। संध्या का समय था। बाबा भारती सुल्तान की पीठ पर सवार होकर घूमने जा रहे थे। इस समय उनकी आँखों में चमक थी, मुख पर प्रसन्नता। कभी घोड़े के शरीर को देखते, कभी उसके रंग को और मन में फूले न समाते थे। सहसा एक ओर से आवाज़ आई, “ओ बाबा, इस कंगले की सुनते जाना।”
आवाज़ में करूणा थी। बाबा ने घोड़े को रोक लिया। देखा, एक अपाहिज वृक्ष की छाया में पड़ा कराह रहा है। बोले, “क्यों तुम्हें क्या कष्ट है?”
अपाहिज ने हाथ जोड़कर कहा, “बाबा, मैं दुखियारा हूँ। मुझ पर दया करो। रामावाला यहाँ से तीन मील है, मुझे वहाँ जाना है। घोड़े पर चढ़ा लो, परमात्मा भला करेगा।”
“वहाँ तुम्हारा कौन है?”
“दुगार्दत्त वैद्य का नाम आपने सुना होगा। मैं उनका सौतेला भाई हूँ।”
बाबा भारती ने घोड़े से उतरकर अपाहिज को घोड़े पर सवार किया और स्वयं उसकी लगाम पकड़कर धीरे-धीरे चलने लगे। सहसा उन्हें एक झटका-सा लगा और लगाम हाथ से छूट गई। उनके आश्चर्य का ठिकाना न रहा, जब उन्होंने देखा कि अपाहिज घोड़े की पीठ पर तनकर बैठा है और घोड़े को दौड़ाए लिए जा रहा है। उनके मुख से भय, विस्मय और निराशा से मिली हुई चीख निकल गई। वह अपाहिज डाकू खड़गसिंह था।बाबा भारती कुछ देर तक चुप रहे और कुछ समय पश्चात् कुछ निश्चय करके पूरे बल से चिल्लाकर बोले, “ज़रा ठहर जाओ।”
खड़गसिंह ने यह आवाज़ सुनकर घोड़ा रोक लिया और उसकी गरदन पर प्यार से हाथ फेरते हुए कहा, “बाबाजी, यह घोड़ा अब न दूँगा।”
“परंतु एक बात सुनते जाओ।” खड़गसिंह ठहर गया।
बाबा भारती ने निकट जाकर उसकी ओर ऐसी आँखों से देखा जैसे बकरा कसाई की ओर देखता है और कहा, “यह घोड़ा तुम्हारा हो चुका है। मैं तुमसे इसे वापस करने के लिए न कहूँगा। परंतु खड़गसिंह, केवल एक प्रार्थना करता हूँ। इसे अस्वीकार न करना, नहीं तो मेरा दिल टूट जाएगा।”
“बाबाजी, आज्ञा कीजिए। मैं आपका दास हूँ, केवल घोड़ा न दूँगा।”
“अब घोड़े का नाम न लो। मैं तुमसे इस विषय में कुछ न कहूँगा। मेरी प्रार्थना केवल यह है कि इस घटना को किसी के सामने प्रकट न करना।”
खड़गसिंह का मुँह आश्चर्य से खुला रह गया। उसका विचार था कि उसे घोड़े को लेकर यहाँ से भागना पड़ेगा, परंतु बाबा भारती ने स्वयं उसे कहा कि इस घटना को किसी के सामने प्रकट न करना। इससे क्या प्रयोजन सिद्ध हो सकता है? खड़गसिंह ने बहुत सोचा, बहुत सिर मारा, परंतु कुछ समझ न सका। हारकर उसने अपनी आँखें बाबा भारती के मुख पर गड़ा दीं और पूछा, “बाबाजी इसमें आपको क्या डर है?”
सुनकर बाबा भारती ने उत्तर दिया, “लोगों को यदि इस घटना का पता चला तो वे दीन-दुखियों पर विश्वास न करेंगे।” यह कहते-कहते उन्होंने सुल्तान की ओर से इस तरह मुँह मोड़ लिया जैसे उनका उससे कभी कोई संबंध ही नहीं रहा हो।
बाबा भारती चले गए। परंतु उनके शब्द खड़गसिंह के कानों में उसी प्रकार गूँज रहे थे। सोचता था, कैसे ऊँचे विचार हैं, कैसा पवित्र भाव है! उन्हें इस घोड़े से प्रेम था, इसे देखकर उनका मुख फूल की नाईं खिल जाता था। कहते थे, “इसके बिना मैं रह न सकूँगा।” इसकी रखवाली में वे कई रात सोए नहीं। भजन-भक्ति न कर रखवाली करते रहे। परंतु आज उनके मुख पर दुख की रेखा तक दिखाई न पड़ती थी। उन्हें केवल यह ख्याल था कि कहीं लोग दीन-दुखियों पर विश्वास करना न छोड़ दे। ऐसा मनुष्य, मनुष्य नहीं देवता है।
रात्रि के अंधकार में खड़गसिंह बाबा भारती के मंदिर पहुँचा। चारों ओर सन्नाटा था। आकाश में तारे टिमटिमा रहे थे। थोड़ी दूर पर गाँवों के कुत्ते भौंक रहे थे। मंदिर के अंदर कोई शब्द सुनाई न देता था। खड़गसिंह सुल्तान की बाग पकड़े हुए था। वह धीरे-धीरे अस्तबल के फाटक पर पहुँचा। फाटक खुला पड़ा था। किसी समय वहाँ बाबा भारती स्वयं लाठी लेकर पहरा देते थे, परंतु आज उन्हें किसी चोरी, किसी डाके का भय न था। खड़गसिंह ने आगे बढ़कर सुलतान को उसके स्थान पर बाँध दिया और बाहर निकलकर सावधानी से फाटक बंद कर दिया। इस समय उसकी आँखों में नेकी के आँसू थे। रात्रि का तीसरा पहर बीत चुका था। चौथा पहर आरंभ होते ही बाबा भारती ने अपनी कुटिया से बाहर निकल ठंडे जल से स्नान किया। उसके पश्चात्, इस प्रकार जैसे कोई स्वप्न में चल रहा हो, उनके पाँव अस्तबल की ओर बढ़े। परंतु फाटक पर पहुँचकर उनको अपनी भूल प्रतीत हुई। साथ ही घोर निराशा ने पाँव को मन-मन भर का भारी बना दिया। वे वहीं रूक गए। घोड़े ने अपने स्वामी के पाँवों की चाप को पहचान लिया और ज़ोर से हिनहिनाया। अब बाबा भारती आश्चर्य और प्रसन्नता से दौड़ते हुए अंदर घुसे और अपने प्यारे घोड़े के गले से लिपटकर इस प्रकार रोने लगे मानो कोई पिता बहुत दिन से बिछड़े हुए पुत्र से मिल रहा हो। बार-बार उसकी पीठपर हाथ फेरते, बार-बार उसके मुँह पर थपकियाँ देते। फिर वे संतोष से बोले, “अब कोई दीन-दुखियों से मुँह न मोड़ेगा।”

Wednesday, 10 December 2014

आतंकवाद: एक छोटा सा विश्लेषण



हर आतंकवादी  विश्लेषण के अंत में अक्सर यही निष्कर्ष कारण के रूप में निकल कर आता है कि इसे जी रहे पात्रों को यही समझाया जाता है कि उनसे  कुछ न कुछ  छीना जा  रहा है । चाहे वो  धर्म हो अधिकार या फिर रोजगार और फिर पुराने समय  की मिथक कथाओं को जिनमें  इन तथाकथित अत्याचारों के विरूद्ध खडे़ पात्र, उनकी विसम परिस्थितियां और अंत में उनकी विजय  गाथा का बार-बार  जिक्र कर इससे बनी धारणाओं को मजबूत कर इन्हें इस फैरीटेल में ढकेल दिया जाता है । तब परीकथाओं में जी रहा यह नायक अपनी वास्तविक जिदंगी में एक  आतातायी  के रूप  में लोगो के सामने  आता है और जब  तक उनका ये भ्रम टूटता है तब तक बहुत देर हो चुकी होती है या तो यह उनका स्वाभाव बन चुका होता है या मजबूरी ।

गौर करें तो इन आतंकवादी गतिविधियों का संचालन सिर्फ और सिर्फ युवा, अपरिपक्व और निर्णयहीन जोशीली मानसिकता पर टिका है जिन्हें यह समझाना मुश्किल है कि समास्याओं के हल लड़ाई झगड़ों या विनाशवृत्ति से नही निकला करते । यदि ऐसा संभव होता तो पूरी दुनियां युद्ध के कगार पर खड़ी होती ? परिणाम स्वारूप झुड़ों में पल रही इन विषाक्त मानसिताओं की जड़ों को काटना मुश्किल दर मुश्किल होता चला जा रहा है । हर प्रयास के बाद इनके नायक और सहायक रिक्तता को भरते चले आ रहे हैं सो इस समस्या का स्थाई हल अब तक दुनियां के सामने नही आ पाया !
मुझे लगता है कि युवा परिचर्चाओं में इन संकीर्ण मानसिकताओं पर चिंतन और परिचर्चा में ही इनका बौद्धिक निवारण शायद युगान्तर में इस सामाजिक विभिषिका से मुक्ति दिला सके, सो युवाओं से ही अपील की जा सकती है कि अपने समूह मे इस विषय के स्पर्श से ही इन विष धारणाओं के प्रति अपनों का आकर्षण न बढ़ने दें, पुरजोर खंडन करें इस छद्म नायकी का, अपनी पूरी कोशिश लगा दें । इसे रोकने सरकार और मीडिया जितना कुछ कर रही हैं सो करने दें हम तो इतना करें , शायद आपकी की गयी ये कोशिशें इस बरबाद होती दुनिया को बचा सके ।

Monday, 8 December 2014

गुड़गांव में फिर हुआ बलात्कार: हल पर मची तकरार

गुड़गांव की मल्टीनेशनल फाइनेंस कंपनी में कार्य करने वाली 27 साल की महिला पर बलात्कार का मामला एक बार फिर ग्रहण लगा गया इन्सानियत पर । आगे वही घिसी पिटी पुनरावृत्ती… विरोध घरना घेराव और अंत में अपराधी का पकड़ा जाना । आगे सजा भी हो जायेगी उसे पर क्या यह क्रम  रूकने वाला है? देखने में तो यही आ रहा है कि वर्तमान में इस प्रकार के अपराध पर लोगों को साथ ले जिम्मेदारी तय करने में लगी हैं राजनैतिक पार्टियां पर  होना क्या है इससे ?
चोरी, डकैती, हत्या या इस क्रम में इनके समान जो भी संज्ञायें जुड़ती हैं वे सब जरूरतों से प्रेरण पा अपराध के रूप में लोगों के सामने आती हैं पर बलात्कार जैसी विभत्सता जरूरतों से नही मानसिकता से निकल महिलाओं को दंशित करती है …अब कानून से इसे कितना बांधा जा सकता है ये तो एक यक्ष प्रश्न है । बड़ी मार्मिकता है इस त्रासदी में हम तो कुछ दिन इस पर चर्चा परिचर्चा, प्रश्न उत्तर कर जिंदगी की मुख्य धारा में हो लेते हैं पर एक कहावत शायद सबके जेहन में होगी “जा के पांव न फटे विबाई वो का जाने पीर पराई” … जिंदगी का पूरा ताना वाना बिखेर देती है यह विडम्बना, स्त्री का आत्मविश्वास जिंदगी की स्थिरता कुछ शेष नही रह जाता तब सभी के जेहन में सिर्फ यही ख्याल आता है कैसे होगा इस समस्या का निवारण, इस महानगरीय उछल कूद से क्या होने वाला है इसका आकलन तो लोग करते चले आ रहे हैं ।
लोग कानून में से रास्ता तलाश रहे हैं जो कभी मुमकिन ही नही है तो क्या है इस समस्या की जड़ में … मानसिक चिकित्सा विज्ञान की माने तो वह यही कहता है कि मन में उठी अपराध प्रेरणा उस नियत क्षण में मनुूष्य को भयहीन कर देती है, अब ऐसे में बनी बहसियत को रोकने इस अवस्था में पहुचने के पूर्व दी गई नसीहत, शिक्षा या संस्कार ही बाड़ का काम कर सकती है । साधारण शब्दों में हममें से कितनों को अपने पूरे जीवन काल में जरूरतों को पूरा करने चोरी का ख्याल न आया हो ! पर चोरी की कितने लोगों ने ? याने हमारे अंदर कुछ न कुछ ऐसा है जो हमें ऐसा करने से रोकता है इसके विपरीत की मनःस्थिती चोर की शक्ल में समाज के सामने आती है । और यही वो मानसिक तकनीकि है जो बलात्कार जैसी घृणित अपराध को रोकने हेतु काम कर सकती है इसे कानून बदल-बदल कर नही मानसिकता को बदलकर ही नियंत्रण में लाया जा सकता है ।
पर कैसे यह मुमकिन होगा ? इस प्रकार की मानसिकता का श्रृजन तो घर की चारदीवारी के अंदर से शुरू होता है और इस विषय की किसी भी परिचर्चा पर अभिभावक पीढ़ियों से तो क्या आज भी कतराते चले आ रहे हैं । इतना सब देखने सुनने के बाद भी आज तक परिवारिक चर्चा में खुलापन नही बन पाया है। पारिवारिक वातावरण में हुई परिचर्चा से ही तो अच्छे बुरे परिणामों का निश्कर्ष निकल कर नई पीढ़ी के सामने आता है और यही आगे चलकर उन्हें पाठशाला और जेल का अंतर समझाता है ।
इस समझाइस पर कार्यशाला का आयोजन इस समस्या के निवारण में महती भूमिका निभा सकता है । इन नगरों, महानगरों की मोमबत्ती परेड़ों से इसे कभी भी नही बदला जा सकता । आकड़े बताते हैं कि भारत में बलात्कार की अपराध दर दुनियां के अन्य देशों की तुलना में कही ज्यादा है पर इसे कानून बदल कर नही संस्कार बदल कर ही रोका जा सकता है ।

Sunday, 7 December 2014

केजरीवाल ही क्यों ?

त्वरित बने रहने की ललक में क्या नही हो रहा हमारे देश में । मीड़िया, राजनीति और यहां तक कि आम लोगों की सोच में । अब केजरीवाल का बिजनेस क्लास में किया गया हवाई सफर सुर्खियों में है । माना की केजरीवाल के फैसले ज्यादातर हड़बड़ाये हुये होते है, इससे वे चर्चित भी हुये सफल भी और बाद में असफल, प्लेन में रायता क्या मांगा मीड़िया ने रायता ही बगरा दिया अरबिंद भाई की राजनीतिक सामाजिक और जाती जिंदगी का  ।
ये सच है कि राजनीति में प्रवेश के बाद लोगों का व्यक्तिगत कुछ नही रह जाता पर मीड़िया या लोगों द्वारा किसी की व्यक्तिगत आजादी का इतना हनन उचित नही लगता । फंड़ कलेक्शन पर मचे इस बवाल ने उचित, अनुचित को दरकिनार कर निष्ठा को निशाना बनाया है पर किसी किसी निष्ठा का आकलन पारिस्थिक नही कालान्तर में निहित होता है ऐसा होते बहुत बार देखा गया है । राजनीति में अर्थ संकलन परम्परा सी बन गया है श्रोत भले ही पता न हो पर हरएक राजनैतिक पार्टी के पास पैसा आ रहा है यह सभी को मालूम है । फिर फंड जमा करने पर यह त्रियासदृष्य खीचातानी क्यो ? विचित्र स्थिती है, तरीकों पर मारा मारी चल रही है पर किसी भी एक दल को इस विषय में निर्विकार कहा जा सके ऐसा कुछ अब हमारे देश में बचा नही ।
इस पूरे प्रकरण में अरबिंद की ये दलील तो उचित लगती है कि आम आदमी तक की पहुच बिजनेस क्लास जैसी बन सके फिर उनकी यह बिजनिस क्लास यात्रा पर बवाल क्यो । तो क्या मीड़िया पर का यह समर सिर्फ हसलिये की ये मिथ बना रहे कि आम लोगो के हालात वैभवसाली वास्तविकता से परे है ? यदि इसका उत्तर ना लगता है तो आम लोगों को समर्पित इस विचार धारा से केजरीवाल का रेक्टीफिेशन क्यों, जहां दूसरे नेता हैलीकाप्टर हायर करते रहे हैं उस तुलना में बिजनिस क्लास में की केजरीवाल की यह हवाई यात्रा तर्कसंगत ही कही जा सकती है ।
रहा उनके अपने आम आदमी दर्शाने का उनका डिस्प्ले तो शायद दुनिया में एक भी ऐसा चरित्र नही मिलेगा जो लोगो के बीच आदर्सिता धारण कर पूरी जिंदगी उसे उसी रूप में निभा पाया हो तब सिर्फ अरबिंद से ही सारा राग द्वेष क्यों औरों को भी इस आर्तनाद में शामिल करना चाहिये.......

Wednesday, 3 December 2014

महिला अत्याचार : पनपती शंकायें

अभी पिछले सप्ताह हरियाणा के रोहतक जिले के एक गांव थाना की रहने वाली दो लड़कियों द्वारा बस में छेड़खानी और उसके बाद बस में ही उन दोनो लड़कियों के द्वारा उनकी की गई जमकर पिटाई पूरे हफ्ते मीड़िया और समाचार पत्रों में चर्चा का विषय रही, हरियाणा सरकार ने इसे साहस बता पुरूस्कार भी घोषित कर दिया इन पर। पर कल इन्ही दोनो लड़कियो का एक दूसरा वीडियो जिसमें ये दोनो लड़किया किसी अन्य स्थान पर दो दूसरे लड़को की पिटाई कर रही थी जब अचानक सामने आया तो इसने पूरा विषय और उस पर होने वाली चर्चा का रूख ही बदल दिया ।
क्या था ये सब वास्तव में महिलाओं पर हो रहा अत्याचार या आदत से मजबूर इन लड़कियों की मानसिकता ? इस पर सच तो बाद में ही सामने आयेगा पर चर्चा तो की ही जा सकती है । जिस तरह से इस दूसरे वीडियो को सामने लाकर इस धारणा को हवा दी जा रही है कि लड़कियों नेें आदतन मार पीट का स्वाभाव बना लिया है, हो सकता है यह बात सही हो पर इसके पीछे हर बार यदि छेड़छाड़ ही कारण में जुड़ा हो तो जितने वार भी इसे दुहराया जाय इसे सही ही ठहराया जायेगा । हां इससे अलग हटकर कुछ और, विचारों को नई दिशा दे सकता है ।
पर इस विचार श्रृखला का एक तथ्यात्मक पहलू और भी है । पीछे गुजरे कुछ सालों में महिलाओं पर हो रहे अत्याचार की खिलाफत में सहानुभूति की बाढ़ सी बह चली है समाज और लोगों में। खुल कर लोग सड़कों पर उतर गये इस पर विरोध करने, लगा समाज महिलाओं की सुरक्षा को लेकर अब जाग गया है। अच्छा ही था ऐसा होना, महिलाओं की सुरक्षा पर एक निश्चिन्ता नजर आई समाज में ।
पर बाद की कुछ घटनाओं ने लोगों की इस मानसिकता को झंझोर कर रख दिया, कुछ प्रकरण ऐसे सामने आये जिसमें महिला अत्याचार या शोषण की शिकायत 6 महिने या साल भर बाद दर्ज करार्इ्र गई। यदि ये शोषण, अत्याचार तक ही सीमित रहती तो जायज कहा जा सकता था, ये समय लेते ही लोगों पर उजागर होती हैं पर जब इसमें बलात्कार जैसी विभीषिका भी शामिल होने लगी तो लोगो ने अपनी  इस शुभचिंतक विचार धारा को दोराहे पर खड़ा पाया ? ऐसा कैसा अत्याचार है भई जो साल 6 महिने बाद महसूस हो रहा है । अब इसे महिला अत्याचार कहे या स्वार्थलिप्त षणयंत्र इन अपवाद घटनाओं का मर्म तो शायद अंत तक संदिग्ध ही रहे पर इस विषय में लोगों का विश्वास अनिस्चित्ता को छूने जरूर लगा है ।
ऐसे और भी अन्य प्रकरण हैं जिनसे महिला प्रताड़ना में समाहित स्वार्थ प्रेरणा की शंका लोगो के विरोध बल को क्षीण करती सी नजर आने लगी है । अपवाद हर विषय में हैं पर इस संवेदनशील मुद्दे में इन अपवादों का रेक्टीफिकेसन लोगों की साधारण समझ के लिये नामुमकिन है । यदि ऐसे ही प्रकरण कुछ समय तक और मीड़िया में अपनी जगह बनाते रहे तो मुश्किल है आने वाले समय में समाज या समाज के लोग इन्हें गंभीरता से लें ।

Tuesday, 2 December 2014

अस्तित्वहीन साया-मध्यवर्ग

सरकार  चाहे  किसी की भी हो  मध्यम वर्ग हमेशा तिरस्कृत ही  रहने वाला है एक अस्तित्वहीन  साये की तरह ! व्यवसायी नोट बैंक हैं सो सरकार उनके साथ है , गरीब वोट बैंक है इसलिये सरकार का उन पर हाथ है । सिर्फ मध्यम वर्ग ही ऐसा रह जाता है जो भारत के नीले आकाश तले अपने खुद के भाग्य के भरोसे है ? सबसे मजेदार बात तो यह है कि वो मध्यम वर्गीय ही है जो किसी भी राजनैतिक धारणाओं को दशा और दिशा देता है, न तो कार्पोरेट को इतनी फुरसद है और न गरीबों को इसकी जरूरत है ।
इस मध्यवर्ती की मायूसी देखिये, जब समय आता है तो उस मायूसी के  बोझ तले वो इतना विरक्त हो जाता है कि खुद वोट डालने ही नहीं जाता । सही भी है, उसे अच्छे से पता कि है ये जो चुनाव हो रहे हैं वो कार्पोरेटों और गरीबों के लिये हो रहे है । कार्पोरेट सरकार को खिलायेगा और सरकार गरीबों को, पर उसके और उसके बच्चों के लिये  तो सिर्फ नौकरी ही अकेला रास्ता है, लोग आस लगाये बैठै हैं पर सरकार एक पीढ़ी को फलांगता समय मांग रही है । परिस्थितियां उम्मीद तो दे सकती हैं पर हालात बदलते नही दिख रहे ! तब कैसे सरकार इन ना बदलते हालातों में नौकरी पैदा कर सकती है ?
पर उन अनावरत मध्यवर्गी जरूरतों का क्या... उसे सिर्फ सांत्वना से तो नहीं बांधा जा सकता, उनका आज उनके सामने मुह बाये खड़ा है सो मजबूरी है कि वे उन्हें खुद के भाग्य से पैदा करे ? उपर से विडम्बना ये कि उन 28,32 या 48 रूपयों के फार्मेट पर लड़ रहे गरीबों के हिस्से के टेक्स का बोझ भी उनके अपने वालेट पर ही पड़ने वाला है । तो शायद यही वो कारण है कि मंहगाई पर उठने वाली चीखों में सबसे उंचा स्वर इसी मध्यम वर्ग से उठता दिखाई पड़ता है ........

Monday, 1 December 2014

मंहगाई और भ्रष्टाचार पर बड़ी बुद्धिमानी से पेश आती भाजपा सरकार..


  
अक्सर जो दिख रहा है वो होता नहीं है और जो होता है वो दिखाई नहीं देता । भारतीय राजनीति कुछ ऐसे ही मोड़ पर आ खड़ी है कांग्रेस बनाम भाजपा ये दो ही पार्टियां भारतीय राजनीति की दिशा और दशा तय करती है । कोई बहुत लंबा इतिहास नहीं है स्वतंत्र भारत का पर इतने कम समय में भी यहां की राजनीति ने बहुत पलटियां खाई हैं । वर्तमान समय भारतीय राजनीति को अजीब से चौराहे तक ले आया है जहां रास्ते तो हैं पर राहगीर पसोपेश में हैं कौन सी राह उसे मंजिल तक पहुचायेगी और मंजिल कौन सी हो इस पर भी राहगीर भ्रमित है।
जिस तरह से वर्तमान में यहां घोटालों और भ्रष्टाचारों का अनावरण हुआ है इससे यहां सरकार बनाने वाले मतदाताओं में हताशा तो पैदा हुई ही साथ ही जिज्ञासा ने भी घर किया है कि आगे आने बाले सालों में उनका भविष्या क्या होगा ? वित्तीय संकटो से जूझती दुनियां से भारत भी परे नहीं है 2008 के बाद से भारतीय अर्थ व्यवस्था भी लगातार हिचकोले खाते हुये ही चलती आ रही है । पर उन हिचकोलेां का असर 2 जी स्पेक्ट्रम से दिखाई पड़ना प्रारंभ हुआ इसके बाद भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन ने अपना सिर उठाया और अब कोल आवंटन से शुरू यह रस्साकसी वर्तमान में काले धन तक आकर ठहर सी गई है । सरकार बदली पर स्थितियां वही की वही है।
केंद्र में बैठी नई भाजपा सरकार आज लोगों में जिज्ञासा और उम्मीद का विषय बन चुकी है । जब भी किसी सरकार पर आरोप लगते हैं उस राजनीतिक पार्टी का संगठन उनकी वकालत के लिये वकील की तरह पेश आता है । कांग्रेस में वकील तो थे पर उनके तरफ से सही तर्क पेश करने वाली वकालत होती कभी भीं दिखाई नही पड़ी, बचाव में कांग्रेस लगभग पूरे टर्म अवाक रही । बचाव में कांग्रेस ने जो भी कुछ कहा उस पर जनता ने अपने कान बंद कर लिये ।
जहां कांग्रेस मांस बेस राजनीतिक पार्टी है इससे ठीक विपरीत उसकी सबसे बड़ी प्रतिद्वन्दी और वर्तमान में शासित माजपा एक केडर बेस राजनैतिक पार्टी है । मिले हुये अवसरों को खोना उनके लिये आत्मघात से कम नहीं है । पूरी तरह से संगठन की कार्यप्रणाली पर निर्भर माजपा जिस समझदारी से जरूरतो पर स्प्लिट और फेस ओन-आफ करती है यही उनके संगठन शक्ति की सही तस्वीर है । 2 जी घोटाले में लगभग एक हजार तिरेसठ करोड़ रूपये और कोल आवंटन में एक हजार तिरासी करोड़ के घाटे की बात सीएजी द्वारा कही गई है । अब घाटे को घोटाले में बदलने में भाजपा किस हद तक कामयाब हुई इसे तो लोकसभा में लिये जनता के निर्णय ने ही बता दिया, भविष्य में होने वाले घाटें के कई हजार करोड़ों रूपये आम लोगों को कांग्रेसी जेबों में दिखलाई देने लगे । कितनी आसानी से उन्होने आगे 20 साल में होने वाले घाटे पर लोगों को ये समझा दिया कि इतने हजार करोड़ रूपये सीधे कांग्रेस की जेब में गये । दूसरी तरफ इन घोटालों की सांख्यकी और उसके मकड़जाल को कांग्रेस, आम जनों को कितना संमझा पाई ? कांग्रेस ने ये सफाई तो दी की सोर्सो को सस्ते में देने के पीछे इनसे बने उत्पादों को जनता तक सस्ते में पहुचाना ही इस सस्ती नीलामी का मुख्य मकसद था पर लोकसभा और उसके बाद के चुनावों में कांग्रेस की वर्तमान दशा, दोनों संगठनों की योग्यता और कर्मठता को आकने का इससे अच्छा उदाहरण कोई दूसरा हो ही नहीं सकता ।
2 जी और कोल आवंटन मामले में कांग्रेस सरकार पर यही आरोप लगा कि उसने मूल्य से कम याने सस्ते में इन उपयोगिताओं की नीलामी की और इससे आर्थिक फायदा उठाया । आर्थिक फायदा उठाना भ्रष्टाचार पर एक अलग मुद्दा हो सकता है और इस पर जबाब देना सरकारी जिम्मेदारी बनती है पर हम यहां मुद्दो पर नही सिर्फ तथ्यों पर बात करेंगे: चाहे ट्रांस कम्यूनीकेशन हो या कोल उत्पादन, ये व्यापारिक प्ले ग्राउंड हैं पर आम लोग भी इसमें किसी न किसी तरह शामिल हो ही जाते हैं। भाजपा ने उस समय की कांग्रेस सरकार पर यह आरोप तो लगाया कि उसनें भविष्य तक के लिये 2 जी और कोल जैसे संशाधनों को व्यापारियों को सस्ते में बेचा पर यहां भाजपा की इन संसाधनों को भविष्य तक के लिये मंहगे में बेचने की मंशा साफ झलकती है । भले ही 2 जी प्रोडक्ट के उपभोक्ता संपन्न और इतनी बड़ी संख्या में न हो पर जितने भी है, हैं तो और मंहगे में मूल उत्पाद एवं संसाधनों की नीलामी याने उपभोक्ताओं के लिये प्राइज हाइक ! निश्चित ही मंहगी नीलामी से आम भारतीय मोवाईल और इन्टरनेट उपभोक्ताओं को उनके उपयोग पर अधिक मूल्य देने की आवश्यकता बनती । इसी तरह चूंकि कोयला और विद्युत किसी भी उत्पाद की उपभोगित उर्जा है और इसी कारण इसका मुगतान कीमतों में जुड़ता है, तो मंहगा कोल भी पावर सेक्टर के व्यापारिक वृत ही नहीं आम उपभोक्ताओं को भी मंहगी बिजली लेने को बाध्य करता है ? इस तरह तो आम जनता के सामने मंहगाई का विरोध कर रहीं भाजपा, लोकसभा में इन मुद्दों पर मंहगी नीलामी का पक्ष लेते हुये मंहगाई का सीधा समर्थन करते दिख रही है पर भाजपा का ये डबल फेस स्टेन्डराइजेशन , कांग्रेस संगठन चुनाव के दौरान कैसे जनता के सामने लाने से चूक गया इस पर जरूर आश्चर्य किया जा सकता है ।
इस तरह तो यही कहा जा सकता है कि संसद में महगाई के पक्ष में अदृष्य राय रखने वाली परंतु जनता के सामने हितेषी बन बढ़ती मंहगाई पर बड़ी बुद्धिमानी से पेश आती भाजपा सरकार अपनी संगठनात्मक कार्यप्रणाली सेे जनता के सामने अपनी इस डबल फेस स्टर्जी को न सिर्फ हमेशा छिपाने में कामयाब रही है बल्कि पेट्रोल डीजल और रसोई गैस की मूल्य वृद्धि जैसे संवेदन शील मुद्दो को नियंत्रित कर देश की वास्तविक अर्थ व्यवस्था को बिगाड़ते इन समीकरणों को छिपाने में भी कामयाव रही .।…..
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Sunday, 30 November 2014

ईश्वर को नकारती हममे छिपी अपराधवृत्ति..

       
       बहुत छोटी सी कहानी है यह जिंदगी को सही दिशा देती, किसी गांव में एक समय बहुत बड़ा आकाल पड़ा, आकाल जब लंबा होने लगा तो लोगों ने ईश्वर की शरण में जाने का फैसला किया । धर्म के नाम पर उस गांव में सिर्फ एक चर्च था वो भी एक झोपड़े में, एक पादरी उसे चलाता था, बस यही कुछ था ।
         परेशानी में लोग उसी के पास पहुचे और अपनी व्यथा कही । पादरी ने कहां संकट तो विकट है, पर हमारे धर्म में सिर्फ प्रार्थना ही की जा सकती है सो यही करते हैं । एक सामूहिक प्रार्थना का आयोजन किया गया गांव के सभी लोगों के इकट्ठा होने लायक जगह झोपड़े में थी नही सो गांव के बाहर का टीला प्रार्थना स्थल के रूप में निश्चित किया गया तथा लोगों को वंहा इकट्ठा होने का आग्रह किया गया । 
          लोग नियत दिन समय पूर्व ही वहां इकट्ठे हो गये । तय समय पर पादरी छाता टेकते वहां पहुंचे, लोगों के सन्मुख हुये भीड़ को गौर से देखा और कहा भाई इस गांव में वर्षा होना मुश्किल है, लोग ईश्वर से बरसात की प्रार्थना करने तो आ पहुंचे पर किसी को ईश्वर पर यकीन नहीं है… कोई एक भी गांव वाला छाता लेकर नहीं आया ऐसे में ईश्वर भला उनकी क्या सुनेगा ?

रामपाल दरबार: सतलोक आश्रम हिसार..

रामपाल दरबार सतलोक आश्रम हिसार में पिछले तीन दिनों में जो कुछ हुआ वो पूरे देश ने देखा । अब जिस घटनाक्रम का समापन पांच मौतों से हो उसे तमाशा तो नही कहा जा सकता ! गंभीर विषय है ये तो इस पर चिंतन भी गंभीर ही होना चाहिये पर लोगों की अभिव्यक्ति तो मीड़िया के गिर्द ही घूमती है अब वो समय है कि इसपर हटकर ही सोचना होगा ।
ईश्वर भक्ति को कौन गलत कह सकता है, धर्म कोई भी हो मूलधारा में तो ईश्वर हैं पर पंथ में पंथप्रधान को हम ईश्वर से भी बड़ा बना देते हैं । सामाजिक पृष्ठ भूमि में तो लोगों के विषय भी अलग हैं विचार धारायें भी अलग है और इस पर वार्तालाप भी भिन्नता लिये होता है पर पंथ में ऐसा नहीं होता, विषय भी एक है व्यक्ति भी एक है और उसी एक की विचारधारा सभी पंथियों पर समान रूप से हावी होती है । समय गुजरते ईश्वर पीछे छूटता जाता है और पूरे पंथ में पंथ प्रधान उसकी जगह ले लेता है फिर जब अहंकार सिर चढ़कर बोलता है तो परिणाम देश, काल, परिस्थिती बदल कर यही होता है जो पिछले तीन दिनों में हमने हिसार में देखा इस पर विडंम्बना यह कि जो कुछ अच्छा हुआ या बुरा वह पंथियों को अच्छा ही लगता है ।
क्या हो गया है लोगों को ? 21वी सदी के वर्तमान में 18वी सदी का अंधानुकरण, अब हम प्रशासन को दोष दे या सरकार को, हल तो जनता से ही निकलना है जंहा प्रशासन और सरकार को इन पंथों पर नजर रखनी चाहिये वहीं लोगों को भी आंख मूंदकर इन पंथ प्रधानों की अंधभक्ति से बचना चाहिये अन्यथा न तो ये पहला प्रकरण है और न ही यह अंतिम होगा । लोग समझें की मन की शांति के लिये तलाशी जा रही ईश्वरी शरण और मानवनिहित आचरण भक्ति में क्या अंतर है अन्यथा यह चक्र हमेशा यो ही पुनरावृत होता रहेगा ।

मंहगाई पर नियंत्रण: थोड़ा हटकर सोचें ..


        दरअसल मंहगाई पर जब भी बात होती है तो हम सरकार से मंहगाई खत्म करने पर नहीं उसके नियंत्रण की बात कर रहे होते हैं । चूंकि मंहगाई खत्म करना किसी भी सरकार के बस सेे बाहर की बात है, पर बात आगे बढ़ते बढ़ते हमारी आपेक्षा जरूर बदल जाती है । अंत मे मंहगाई मुद्दे पर हमें भड़ासने के लिये सरकारी देह एक मारीच के रूप में जरूर मिल जाती है ! पर यह पूरी वास्तविकता नहीं है ?
       पूरी वस्तुओं पर मूल्य नियंत्रण सरकार के हांथों में कभी नही रहा ही नही। गिनी चुनी चीजों को छोड़कर बांकी संभी वस्तुओं सरकारी मूल्य नियंत्रण से परे हैं । जब भी मंहगाई की बात शुरू होती है हमारे जेहन में टैक्स जैसा शब्द सबसे पहले उभर कर आता है और यही अटक कर हम मान बैठते है कि यही वो कारण जो मंहगाई के लिये वास्तविक जिम्मेदार ? गौर करेे हमारे धर परिवार चलाने के जो आर्थिक आधार हम निर्धारित करते है और जिनका अनुसरण कर हम धर परिवार चला पाने लायक हो पातेे हैं वो ही आर्थिक आधार देश को भी चलाते है । उनका अनुसरण करना सरकार की अनिवार्यता है । इसको साधारण शब्दों में यो समझा जा सकता है: जैसे काल परिस्थती के अनुसार हम किराये पर दिये अपने किसी माकान का किराया सतत् बढ़ाते रहने की प्रवृति रखते हैं क्योंकि यह हमारी जरूरत है वैसे ही सरकार देश की जरूरत के मुताविक टैक्सों पर बड़ते क्रम में बदलाव लाती रहती है याने टैक्स का लगना और बढ़ना एक सतत और आर्थिक सुधार की स्वाभाविक प्रक्रिया है । इस स्वाभाविक अर्थनीति को हम मंहगाई से जोड़ अल्पज्ञान के आधार पर इसे ही महगाई का वास्तविक कारण मान लेते है ।
      अपने दिमांग पर यदि हम जरा सा भी जोर डालकर सोचे तो मंहगाई पर टैक्स की दखलनदाजी को आसानी से समझा जा सकता है । आपने कभी सोचा है कि जिस अनुपात में टैक्स बढ़ता है तो उसकी प्रतिक्र्रिया में आवश्यक वस्तुओ पर जो मूल्यवृद्धि होती है क्या उसका अनुपात उस वृद्धि को उचित ठहराता है ? कदापि नहीं, किसी वस्तु पर 1 रूपय टैक्स वृद्धि होने पर मूल्य 5 रूपये तक बढ़ते है, हां यही सच है और यह सारा प्रपंच टैक्स वृद्धि की आड़ में पूरी कारपोरेट लावी द्वारा रचा जाता है । यही वो लोग, वो असली वजह है जो जनसाधारण की हैसियत देखकर नही बल्कि अपने फायदे को देखकर मूल्य उछालते है ! तो क्या इस पर ढीकरा फोड़ने सिर्फ सरकार का ही सिर दिखाई देना चाहये ? हमारे समाज में ही बसते उन गुनहगार सिरों की अनदेखी करनी चाहिये ? ये कुछ विचारने लायक प्रश्न हैं ।
       सामाजिक विसमताओं की बात करें तो भारत में एक ही समय में एक साथ बहुत से समाज बसते हैं । कुछ तो ऐसे है जिनके लिये मंहगाई ज्यादा कुछ नहीं एक स्टेट्स सिंबल है पर बहुत ज्यादा ऐसे जिनके लिये मंहगाई मायने रखती है, पर एक सच्चाई यह भी है कि तथाकथित यह दूसरा मध्यम वर्ग भी समाज मे प्रतिष्ठा पर्याय बन चुके इन सामानों से अछूता नहीं रहना चाहता जो अब समाजिक प्रतिष्ठा की मजबूरी बन चुके है । पर इन विलासिता सामग्री की मूल्य वृद्धि पर तो सरकार का कोई हस्तक्षेप ही नहीं है तब फिर क्यो हम उसे मंहगाई से जोड़ हमेशा सरकारी सिर पर ही मढ़ते रहें ।
         सच पूछा जाये तो ये सरकार की नही लोगों की ही गलती है, अपने ना ढो सकने वाले शौकों को मंहगाई   का नाम देते उन्हें जरा भी संकोच नही होता हैं । मंहगाई पर जिस दिशा में मुंह कर हम चिल्ला रहे है वहां से तो सिर्फ हमारी गूंज ही वापिस आ सकती है.. यह समस्या का उत्तर तो कदापि नहीं, पर हां यह बात जरूर सच है कि गूंज सुनने में लोगों को मजा बहुत आता है । शायद मेरी कही ये बातें बहुतों को बुरी लगें पर यदि गंभीरता की बात करें तो मंहगाई के इस नासूर को दबाकर मवाद निकालने की कोशिश में मवाद तो निकलने से रहा,हा आह जरूर सुनाई देगी लोगों की।

संस्कृत बनाम जर्मनी


     एक नया विवाद उठ खड़ा  हुआ है कैन्द्रीय शिक्षा  पाठ्यकृम मे ! जर्मनी भाषा को निकाल  संस्कृत  को  रोपने   का । एक  तीर आकर  लगा अचानक केवीएस में अध्ययन करते  छात्रों पर मानव संसाधन मत्रालय के लिये इस निर्णय का कि अब केवीइस के 1100 में से 500 स्कूलों में वैकल्पिक पाठ्यक्रम के रूप में ली गई जर्मन भाषा के 70000 छात्रों को  भाषा की जगह संस्कृत भाषा पढ़नी होगी ।

           पिछले 15 सालों के इतिहास में देखे तो सबसे ज्यादा विदेश यात्रा करने वाले प्रधान मंत्री मोदी जी  ही है वर्तमान में विदेश नीति की जो छबि उन्होने देश  वासियों को दिखाई इसे अब देश में नजीर की तरह पेश भी किया जाने लगा है । वैश्वीकृत होती इस दुनियां में धुरी बनने का प्रयास करते  मोदी जी विज्ञान  और  विकास कोअपने दोनों चौड़े कंधों पर शोभित कर  विश्व परिक्रमां  में लगे हुये हैं पर  संध की सोच उत्तरभारत तक ही अटकी नजर आती है । इस संस्कृत बनाम जर्मन भाषा पर उठे विवाद पर मोदी जी ने आपत्ति तो क्या हल्का सा विरोध भी नहीं  जताया ।  आश्चर्य है  दुनियां के सामने  वैश्वीकृत छवि धारण करने वाला यह चरित्र अपने घर के अंदर  रूढ़िवादी है । सो मानव संसाधन  विभाग  से ये फरमान जारी  करने में ज्यादा कुछ दिक्कते नही आई की भविष्य में केन्द्रीय  विघायालयों में  अतिरिक्त  विषय के रूप में  जर्मनी  नही अब संस्कृत का  पठन  होगा ।
          अच्छा है संस्कृत भाषा हमारी विरासत है यह हमारे लिये तो मान सम्मान का विषय हो सकता है पर सोचना यह है कि आज के समय इसकी प्रायोगिकता कितनी है ? न तो इसे विज्ञान से जोड़ा जा सकता और न ही इस दौर के व्यापारीकरण से । भारत को छोड़ दुनियां के कितने देश या कितने लोग इस भाषा का प्रयोग करते है या यो कहे इस भाषा के बारे में जानते भी हैं ? शादी ब्हाय, पूजा पाठ और धर्मध्यान से आगे तो इस भाषा की बढ़त हमारे खुद के देश में भी नही है ।
           इस फैसले पर यदि सिर्फ जर्मनी नजर तिरछी करता तो उसे सहा भी जा सकता था पर वो हजारों-हजार जर्मन भाषा की शिक्षा लेते विद्यार्थी जो पीछे इसमें दाखिला ले चुके हैं उनके भविष्य का क्या ? संध यदि संस्कृत लाना ही चाह रहा था तो लाता पर जर्मनी भाषा को हटाकर ही क्यों ? होना तो यह चाहिये था कि वैश्वीकृत होती इस दुनियां में संस्कृत तो क्या फ्रेन्च, लेटिन रशियन या दुनियां की भिन्न भाषाओं के पठन पाठन का विकल्प बच्चों को दिया जाना चाहिये था हां उसमे यदि संस्कृत वैकल्पिक विषय के रूप में प्रस्तुत की जाती तो इससे उसका मान सम्मान कही से भी कम नही होने वाला था, और यह पहल मोदी जी करते तब ही उन्हें विश्वदृष्टा कहा जा सकता था ।
             विश्वबंधुता की बात करें तो उनकी अपनी भाषा में उनसे किया गया संवाद अंदर तक पहुच उनके बीच हमारे आने जाने का रास्ता बनाता है और यही वाणिज्यिक क्षमता हमारे देश को, देश के लोगों को उनके बीच स्थापित कर भीतर तक पहुच बना सकती है । महज संध प्रवर्तन को दर्शाने इस अदूरदर्शी आदेश को देश पर मढ़ देना उचित नही है । कोई भी खतरनाक खेल जाली के भीतर खेला जाता है शूटिंग रेंज जनविहीन स्थान पर बनई जाती है इसके पीछे उद्धेश्य यह होता है कि लोगे को इससे नुकसान न हो पर संध विचारधारा को प्रतिष्ठित एवं प्रमाणित करने के लिये शिक्षा और इससे जुड़े हजारों बच्चों को वालंटियर जैसा उपयोग कर क्यों उनका भविष्य दाव पर लगाया जा रहा है यह चिंता का विषय है । सबसे ज्यादा दुख तो यह है कि संध विचारधारा का प्रवर्तन कर रहे बुद्धिजीवी कहलाने वाले अध्यापकों द्वारा संस्कृत स्थापन का यह विषय उठाया गया ।