हर आतंकवादी विश्लेषण के अंत में अक्सर यही निष्कर्ष कारण के रूप में निकल कर आता है कि इसे जी रहे पात्रों को यही समझाया जाता है कि उनसे कुछ न कुछ छीना जा रहा है । चाहे वो धर्म हो अधिकार या फिर रोजगार और फिर पुराने समय की मिथक कथाओं को जिनमें इन तथाकथित अत्याचारों के विरूद्ध खडे़ पात्र, उनकी विसम परिस्थितियां और अंत में उनकी विजय गाथा का बार-बार जिक्र कर इससे बनी धारणाओं को मजबूत कर इन्हें इस फैरीटेल में ढकेल दिया जाता है । तब परीकथाओं में जी रहा यह नायक अपनी वास्तविक जिदंगी में एक आतातायी के रूप में लोगो के सामने आता है और जब तक उनका ये भ्रम टूटता है तब तक बहुत देर हो चुकी होती है या तो यह उनका स्वाभाव बन चुका होता है या मजबूरी ।
गौर करें तो इन आतंकवादी गतिविधियों का संचालन सिर्फ और सिर्फ युवा, अपरिपक्व और निर्णयहीन जोशीली मानसिकता पर टिका है जिन्हें यह समझाना मुश्किल है कि समास्याओं के हल लड़ाई झगड़ों या विनाशवृत्ति से नही निकला करते । यदि ऐसा संभव होता तो पूरी दुनियां युद्ध के कगार पर खड़ी होती ? परिणाम स्वारूप झुड़ों में पल रही इन विषाक्त मानसिताओं की जड़ों को काटना मुश्किल दर मुश्किल होता चला जा रहा है । हर प्रयास के बाद इनके नायक और सहायक रिक्तता को भरते चले आ रहे हैं सो इस समस्या का स्थाई हल अब तक दुनियां के सामने नही आ पाया !
मुझे लगता है कि युवा परिचर्चाओं में इन संकीर्ण मानसिकताओं पर चिंतन और परिचर्चा में ही इनका बौद्धिक निवारण शायद युगान्तर में इस सामाजिक विभिषिका से मुक्ति दिला सके, सो युवाओं से ही अपील की जा सकती है कि अपने समूह मे इस विषय के स्पर्श से ही इन विष धारणाओं के प्रति अपनों का आकर्षण न बढ़ने दें, पुरजोर खंडन करें इस छद्म नायकी का, अपनी पूरी कोशिश लगा दें । इसे रोकने सरकार और मीडिया जितना कुछ कर रही हैं सो करने दें हम तो इतना करें , शायद आपकी की गयी ये कोशिशें इस बरबाद होती दुनिया को बचा सके ।

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