Wednesday, 17 December 2014

तिरस्कृत वृद्धावस्था : सच होती कहानी

परिवर्तन श्रृष्टि का शाशवत् नियम है इसी परिवर्तन के परिवहन से हम पाषाण युग से अब तक का समय तय करते चले आ रहे हैं। इसके मूल में जिज्ञासा है और यही जिज्ञासा बुद्धि का प्रादुर्भाव करती है । पर श्रृष्टि का यह परिवर्तन पथ है बहुत क्रूर, कितनी ही प्राणी जातिया, संस्कृतियां और अब तक की तिथियां सब निगल गया अपने अंदर और फिर भी इसकी यह न खत्म होने वाली भूख बरकरार है । पर इतना सब खोने के बाद भी हर परिवर्तन के पश्चात् मनुष्य अपने को पहले से ज्यादा श्रेष्ठ समझता चला आ रहा है । भौतिक नजरिये से ये बात ठीक लगती है पर अध्यात्मिक दृष्ठि डाले तो मनुष्य की इस तथा कथित श्रेष्ठता में हजारों सिकुड़ने नजर आती है ।
इस पर विषय तो बहुत से है जिन पर चर्चा होनी चाहिये पर वर्तमान में वो एक विषय जिससे समाज स्वयं लजाने लगा है परिवारिक प्रतिष्ठा के अहंभाव से ग्रसित यह विषय अखबार की सुर्खिया बन कर तो नही बोलता पर हां इस “वृद्ध बहिष्कार” के चर्चे जन श्रृतियों में इधर उधर बिखरे हर कहीं बहुतायत से नजर जरूर आने लगे हैं । परिवारो के लिये वृद्धावस्था अब चिंता का नही अपितु परेशानी का विषय बन गई है सो अवस्था परिवर्तन की इस डगर में ये परिवहन विहीन वृद्ध अपने अस्तित्व को तलासते दर दर की ठोकरें खा रहे हैैं । समझ नही आता किस भावना के वशीभूत उनके खुद के परिजन उनकी संतान कैसे इतनी तंगदिल हो सकती है । हां वृद्ध बहिस्कार पर एक पुरानी कहानी याद आई प्रंसगवश उसका समावेश यहां उचित लगता है ।
किसी समय भटकते बंदरों का एक झुंड़ एक राजा के राजमहल में बने बागीचे में जा पहुंचा । बागीचे से लगा घुड़साल था उसके आस पास सूखी घास का जमाबड़ा था और वही बगल में राजा की पाकशाला थी फिर क्या था खाने को बचा भोजन  और उछल कूद को बागीचा, बंदरों ने वहीं अपना ढेरा डाल लिया । दिन मजे से कटने लगे राजा ने उस समय के रिवाज से दूध के लिये गायों के साथ कुछ बकरियां भी पाल रखी थी उनमें यदा कदा भेढ़ भी थी । सारे बंदर उछल कूद करते पर उनसे से एक बुजुर्ग बंदर आराम के समय में वहां की गतिविधियों पर ध्यान देता बकरियों में की एक भेढ़ जिसकी पाकशाला में मुंह मारने की आदत पड़ गई थी अक्सर पाकशाला में धुस जाती तब वहां का सहायक पंडित उसे भगाने, सामने जो भी चीज हो दे मारता । वृद्ध बंदर बार-बार इस घटनाक्रम को पुनरावृत होते देखता और चिेतित हो जाता । एक दिवस उसने सारे बंदरों को इकट्ठा किया और इस घटना का जिक्र उन सभी के सामने किया दूसरे बंदरों ने इसे सुना तो पर कहा यही कि भेढ़ की इस आदत से उन्हे क्या फर्क पड़ने बाला है तब बुजुर्ग बंदर ने कहा कि चिंता भेढ़ की आदत से नही रसोईये की आदत से हो रही है उसे भगाने जो भी चीज हाथ में आती है दे मारता है किसी दिन रसोई बनाते जलती लकड़ी ही दे मारा तो ? तो इससे क्या होगा … बुजुर्ग बंदर ने समझाने की कोशिश की, कहा भेढ़ के बाल है जलती लकड़ी से बाल आग पकड़ लेगें तब भेढ़ घबराकर इघर उधर भागेगी यदि घास के बाड़े तरफ गई तो उनमें आग लग जायेगी और यह आग अपने साथ साथ घोड़ों को भी जला देेगी इस शंका के साथ उसने मुख्य निष्कर्ष दिया मनुष्यों के चिकित्सा विधान में कहा गया है कि यदि घोड़ों के जले में बंदर की चर्बी लगाई जाये तो उनके घाव शीघ्र ठीक हो जाते है चूकि घोड़े युद्ध के लिये आवश्यक साधन है ऐसे में उन्हे बचाने , बदंरो को मारने में राजा को जरा भी परहेज नही होगा । हम सब के सब मारे जायेंगे सो भविष्य में आने वाली आपदा से पहले ही हमें यहा से निकल जाना चाहिये । बांकी बंदरों ने उस वृद्ध बंदर को हिमाकत की नजर से देखा उसकी इस सोच का मजाक उड़ाया और फिर खेल कूद में लग गये ।
वृद्ध बंदर दुखी मन लेकर बहां से चल पड़ा राजमहल के बाहर आ एक वृक्ष में पनाह ले किसी अनहोनी की राह देखने लगा । फिर एक दिन हुआ भी वही रसोइये ने भेढ़ को जलती लकड़ी दे मारी उसके बाल जलने लगे घबराकर बह धास के बाडे़ में जा घुसी । घास के साथ सारे घोड़े जलकर जख्मी हो गये । राजवैद्य की सलाह और राजा के आदेश पर तीरंदाजों ने सारे बंदरों को मार गिराया । दूर से यह सब देख रहा बृद्ध बंदर दुखी मन से जंगल की तरफ चल पड़ा । अनजाने जंगल में बृद्ध बंदर को जब प्यास लगी तो एक पोखर उसे नजर आया आदतन उसने चारो तरफ गौर किया, वहां पोखर तक प्यास बुझाने पहुचें जानवरों के जाने के तो पदचिन्ह थे पर किसी के लौटते पद चिन्ह नजर नहीं आ रहे थे । बंदर को कुछ शंका हुई पर प्यासा था पानी तो पीना ही था सो एक सरकंड़े की लकड़ी तोड़ दूर से उसके जरिये पानी पीने लगा । तुरंत ही पानी में हलचल हुई और वहां पानी से निकल एक यक्ष सामने आया । बंदर दूर था उसकी पहुंच के बाहर सो कुछ कर न सका वह। तब यक्ष बोला यहां आने वाले तुम पहले प्राणी हो जो मेरा भोजन बनने से बच गये, बंदर तुम तो बहुत बुद्धिमान हो पर अकेले लग रहे हो साथी कहां गये तुम्हारे । बंदर ने उसे अपनी पूरी कथा कह सुनाई यक्ष ने सब सुना और कहा तुम यहा रह तो सकते हो पर शर्त यही होगी कि यहां आने वाले किसी भी प्राणी को तुम नही चेताओगे कि मैं यहा हूं । तुम समझदार हो पर सभी ऐसे नहीं होते हां नासमझी में यदि सही सलाह शामिल हो जाये तो वेबाकूफी को समझदारी में बदलते देर नही लगती । तुम यहां ऐसा कर सकते हो पर इससे मुझे भूखा रहना पडे़गा । बंदर ने उसकी बात मान ली सोचा यही उसकी नियती, उसका श्राप है मेरे बदलने से क्या कुछ बदल जायेगा । दिन कटने लगे एक दिवस वही राजा अपने परिवार के साथ उसी जंगल में शिकार पर आया और रास्ता भटक गया, प्यास से व्याकुल राजपरिवार पानी को तरस रहा था। बंदर ने तुरंत उसे पहचान लिया राजा को देखते ही बंदर को अपने मरते परिजनों की याद आ गई उसका मन क्रोध और बदले से भर उठा । जंहा कही भी पानी हो उसे बंदर डूंढ़ ही लेते है, बंदरों के इस स्वाभाव से परिचित राजपरिवार पानी की लालसा में बंदर के पीछे हो लिया । वृद्ध बंदर उन्हें उसी पोखर में ले गया जहां यक्ष का वास था । पानी देखते ही पूरा राजपरिवार पानी में कूद पड़ा और अंततः यक्ष का भक्षण बना । इस तरह अपनी बुद्धिमानी से वृद्ध बंदर ने न सिर्फ अपनी जान बचाई बल्कि अपने परिजनों की मौत का बदला लिया ।
बुर्जुगों के निर्णयों में दूरगामी सोच के साथ साथ अपने जिंदगी भर के अनुभवों का निचोड़ भी समाहित होता है । हम उन्हें अपने निर्णयों में स्थान दें न दें ! मान सम्मान दें न दें पर अपने दिल में अपने घर में स्थान तो दे ही सकते हैं । और ऐसा करके हम उन पर नही अपने आप पर अहसान करते हैं । क्योकि आप माने न माने आपके पैदा होने से लेकर उनके अंत तक आप उनके ऋणि थे, हैं और रहेंगे …. आपके इर्द गिर्द यदि ऐसा हो रहा हो तो जहां तक हो सके उनकी सोच बदले, ऐसा करने से रोकें उन्हे और यह मानवता पर आपका किया एक अहसान होगा।

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