Monday, 8 December 2014

गुड़गांव में फिर हुआ बलात्कार: हल पर मची तकरार

गुड़गांव की मल्टीनेशनल फाइनेंस कंपनी में कार्य करने वाली 27 साल की महिला पर बलात्कार का मामला एक बार फिर ग्रहण लगा गया इन्सानियत पर । आगे वही घिसी पिटी पुनरावृत्ती… विरोध घरना घेराव और अंत में अपराधी का पकड़ा जाना । आगे सजा भी हो जायेगी उसे पर क्या यह क्रम  रूकने वाला है? देखने में तो यही आ रहा है कि वर्तमान में इस प्रकार के अपराध पर लोगों को साथ ले जिम्मेदारी तय करने में लगी हैं राजनैतिक पार्टियां पर  होना क्या है इससे ?
चोरी, डकैती, हत्या या इस क्रम में इनके समान जो भी संज्ञायें जुड़ती हैं वे सब जरूरतों से प्रेरण पा अपराध के रूप में लोगों के सामने आती हैं पर बलात्कार जैसी विभत्सता जरूरतों से नही मानसिकता से निकल महिलाओं को दंशित करती है …अब कानून से इसे कितना बांधा जा सकता है ये तो एक यक्ष प्रश्न है । बड़ी मार्मिकता है इस त्रासदी में हम तो कुछ दिन इस पर चर्चा परिचर्चा, प्रश्न उत्तर कर जिंदगी की मुख्य धारा में हो लेते हैं पर एक कहावत शायद सबके जेहन में होगी “जा के पांव न फटे विबाई वो का जाने पीर पराई” … जिंदगी का पूरा ताना वाना बिखेर देती है यह विडम्बना, स्त्री का आत्मविश्वास जिंदगी की स्थिरता कुछ शेष नही रह जाता तब सभी के जेहन में सिर्फ यही ख्याल आता है कैसे होगा इस समस्या का निवारण, इस महानगरीय उछल कूद से क्या होने वाला है इसका आकलन तो लोग करते चले आ रहे हैं ।
लोग कानून में से रास्ता तलाश रहे हैं जो कभी मुमकिन ही नही है तो क्या है इस समस्या की जड़ में … मानसिक चिकित्सा विज्ञान की माने तो वह यही कहता है कि मन में उठी अपराध प्रेरणा उस नियत क्षण में मनुूष्य को भयहीन कर देती है, अब ऐसे में बनी बहसियत को रोकने इस अवस्था में पहुचने के पूर्व दी गई नसीहत, शिक्षा या संस्कार ही बाड़ का काम कर सकती है । साधारण शब्दों में हममें से कितनों को अपने पूरे जीवन काल में जरूरतों को पूरा करने चोरी का ख्याल न आया हो ! पर चोरी की कितने लोगों ने ? याने हमारे अंदर कुछ न कुछ ऐसा है जो हमें ऐसा करने से रोकता है इसके विपरीत की मनःस्थिती चोर की शक्ल में समाज के सामने आती है । और यही वो मानसिक तकनीकि है जो बलात्कार जैसी घृणित अपराध को रोकने हेतु काम कर सकती है इसे कानून बदल-बदल कर नही मानसिकता को बदलकर ही नियंत्रण में लाया जा सकता है ।
पर कैसे यह मुमकिन होगा ? इस प्रकार की मानसिकता का श्रृजन तो घर की चारदीवारी के अंदर से शुरू होता है और इस विषय की किसी भी परिचर्चा पर अभिभावक पीढ़ियों से तो क्या आज भी कतराते चले आ रहे हैं । इतना सब देखने सुनने के बाद भी आज तक परिवारिक चर्चा में खुलापन नही बन पाया है। पारिवारिक वातावरण में हुई परिचर्चा से ही तो अच्छे बुरे परिणामों का निश्कर्ष निकल कर नई पीढ़ी के सामने आता है और यही आगे चलकर उन्हें पाठशाला और जेल का अंतर समझाता है ।
इस समझाइस पर कार्यशाला का आयोजन इस समस्या के निवारण में महती भूमिका निभा सकता है । इन नगरों, महानगरों की मोमबत्ती परेड़ों से इसे कभी भी नही बदला जा सकता । आकड़े बताते हैं कि भारत में बलात्कार की अपराध दर दुनियां के अन्य देशों की तुलना में कही ज्यादा है पर इसे कानून बदल कर नही संस्कार बदल कर ही रोका जा सकता है ।

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