सरकार चाहे किसी की भी हो मध्यम वर्ग हमेशा तिरस्कृत ही रहने वाला है एक अस्तित्वहीन साये की तरह ! व्यवसायी नोट बैंक हैं सो सरकार उनके साथ है , गरीब वोट बैंक है इसलिये सरकार का उन पर हाथ है । सिर्फ मध्यम वर्ग ही ऐसा रह जाता है जो भारत के नीले आकाश तले अपने खुद के भाग्य के भरोसे है ? सबसे मजेदार बात तो यह है कि वो मध्यम वर्गीय ही है जो किसी भी राजनैतिक धारणाओं को दशा और दिशा देता है, न तो कार्पोरेट को इतनी फुरसद है और न गरीबों को इसकी जरूरत है ।
इस मध्यवर्ती की मायूसी देखिये, जब समय आता है तो उस मायूसी के बोझ तले वो इतना विरक्त हो जाता है कि खुद वोट डालने ही नहीं जाता । सही भी है, उसे अच्छे से पता कि है ये जो चुनाव हो रहे हैं वो कार्पोरेटों और गरीबों के लिये हो रहे है । कार्पोरेट सरकार को खिलायेगा और सरकार गरीबों को, पर उसके और उसके बच्चों के लिये तो सिर्फ नौकरी ही अकेला रास्ता है, लोग आस लगाये बैठै हैं पर सरकार एक पीढ़ी को फलांगता समय मांग रही है । परिस्थितियां उम्मीद तो दे सकती हैं पर हालात बदलते नही दिख रहे ! तब कैसे सरकार इन ना बदलते हालातों में नौकरी पैदा कर सकती है ?
पर उन अनावरत मध्यवर्गी जरूरतों का क्या... उसे सिर्फ सांत्वना से तो नहीं बांधा जा सकता, उनका आज उनके सामने मुह बाये खड़ा है सो मजबूरी है कि वे उन्हें खुद के भाग्य से पैदा करे ? उपर से विडम्बना ये कि उन 28,32 या 48 रूपयों के फार्मेट पर लड़ रहे गरीबों के हिस्से के टेक्स का बोझ भी उनके अपने वालेट पर ही पड़ने वाला है । तो शायद यही वो कारण है कि मंहगाई पर उठने वाली चीखों में सबसे उंचा स्वर इसी मध्यम वर्ग से उठता दिखाई पड़ता है ........

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