अभी पिछले सप्ताह हरियाणा के रोहतक जिले के एक गांव थाना की रहने वाली दो लड़कियों द्वारा बस में छेड़खानी और उसके बाद बस में ही उन दोनो लड़कियों के द्वारा उनकी की गई जमकर पिटाई पूरे हफ्ते मीड़िया और समाचार पत्रों में चर्चा का विषय रही, हरियाणा सरकार ने इसे साहस बता पुरूस्कार भी घोषित कर दिया इन पर। पर कल इन्ही दोनो लड़कियो का एक दूसरा वीडियो जिसमें ये दोनो लड़किया किसी अन्य स्थान पर दो दूसरे लड़को की पिटाई कर रही थी जब अचानक सामने आया तो इसने पूरा विषय और उस पर होने वाली चर्चा का रूख ही बदल दिया ।
क्या था ये सब वास्तव में महिलाओं पर हो रहा अत्याचार या आदत से मजबूर इन लड़कियों की मानसिकता ? इस पर सच तो बाद में ही सामने आयेगा पर चर्चा तो की ही जा सकती है । जिस तरह से इस दूसरे वीडियो को सामने लाकर इस धारणा को हवा दी जा रही है कि लड़कियों नेें आदतन मार पीट का स्वाभाव बना लिया है, हो सकता है यह बात सही हो पर इसके पीछे हर बार यदि छेड़छाड़ ही कारण में जुड़ा हो तो जितने वार भी इसे दुहराया जाय इसे सही ही ठहराया जायेगा । हां इससे अलग हटकर कुछ और, विचारों को नई दिशा दे सकता है ।
पर इस विचार श्रृखला का एक तथ्यात्मक पहलू और भी है । पीछे गुजरे कुछ सालों में महिलाओं पर हो रहे अत्याचार की खिलाफत में सहानुभूति की बाढ़ सी बह चली है समाज और लोगों में। खुल कर लोग सड़कों पर उतर गये इस पर विरोध करने, लगा समाज महिलाओं की सुरक्षा को लेकर अब जाग गया है। अच्छा ही था ऐसा होना, महिलाओं की सुरक्षा पर एक निश्चिन्ता नजर आई समाज में ।
पर बाद की कुछ घटनाओं ने लोगों की इस मानसिकता को झंझोर कर रख दिया, कुछ प्रकरण ऐसे सामने आये जिसमें महिला अत्याचार या शोषण की शिकायत 6 महिने या साल भर बाद दर्ज करार्इ्र गई। यदि ये शोषण, अत्याचार तक ही सीमित रहती तो जायज कहा जा सकता था, ये समय लेते ही लोगों पर उजागर होती हैं पर जब इसमें बलात्कार जैसी विभीषिका भी शामिल होने लगी तो लोगो ने अपनी इस शुभचिंतक विचार धारा को दोराहे पर खड़ा पाया ? ऐसा कैसा अत्याचार है भई जो साल 6 महिने बाद महसूस हो रहा है । अब इसे महिला अत्याचार कहे या स्वार्थलिप्त षणयंत्र इन अपवाद घटनाओं का मर्म तो शायद अंत तक संदिग्ध ही रहे पर इस विषय में लोगों का विश्वास अनिस्चित्ता को छूने जरूर लगा है ।
ऐसे और भी अन्य प्रकरण हैं जिनसे महिला प्रताड़ना में समाहित स्वार्थ प्रेरणा की शंका लोगो के विरोध बल को क्षीण करती सी नजर आने लगी है । अपवाद हर विषय में हैं पर इस संवेदनशील मुद्दे में इन अपवादों का रेक्टीफिकेसन लोगों की साधारण समझ के लिये नामुमकिन है । यदि ऐसे ही प्रकरण कुछ समय तक और मीड़िया में अपनी जगह बनाते रहे तो मुश्किल है आने वाले समय में समाज या समाज के लोग इन्हें गंभीरता से लें ।

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