Saturday, 27 December 2014

धर्मपरिवर्तन: आज के परिवेश में


अजीब सा माहोल हो चला है यहां, सत्ता बदलते ही सरकार के साथ साथ एक समानान्तर व्यवस्था का पदार्पण जिसमें सनातनी धर्म संरक्षण की मुहिम का लगातार आव्हान किया जा रहा है । घर वापिसी अभियान, हिन्दु राष्ट्र घोषणा, गैर धर्मियों के लिये जगह नही ये सब कोटेसन वही से निकल के आ रहे हैं । ऐसा लगने लगा है जैसे सनातन धर्म खतरे में हैंं । अब तक तो धर्म के प्रति समर्पण ही देखने सुनने में आता था अब अचानक से धर्म के प्रति सजगता भी दिखाई पड़ने लगी है जैसे धर्म आस्था नही संपत्ति हो गया और जिसके लुटने का भय पैदा हो गया सो अब इसकी रक्षा में कमर कसने का समय आ गया है ? मेरी इन टिप्पणियों पर शायद बहुत सी आलोचनायें निकल कर सामने आयें पर धर्म से जुड़ी आस्था मेरा विषय नही है पर धर्म के इर्द गिर्द निर्मित परिस्थितियों पर मेरा केन्द्रण है । प्रश्न वही है कि आखिर धर्म को किस बात का खतरा है हिन्दू कहते है मुसलमानों से और मुसलमान कहते है हिन्दु से, बीच में समानुपातिक भाव से क्रिश्चियनटी को भी जोड़ दिया जाता है । अब मुसलमान तो पूरी दुनिया के धर्माे को इस्लामियत के लिये खतरा बताने लग गये हैं, खैर यहां हिन्दुओं पर बात हो रही है तो उसे ही आगे ले चलते है । वास्तविक्ता में इस प्रश्न की सच्चाई तो कही बहुत नीचे छिपी पड़ी है जिस तक आम लोग पहुच ही नही पा रहे है !
जो जिस संस्कार में जनमता है वही उसका वास्तिविक धर्म होता है हिन्दु के यहा हिन्दु और मुुसलमान के यहां तो मुसलमान ही पैदा होगा क्योकि परिवार के दिये संस्कार ही आखिर उसे हिन्दु या मुसलमान बनाते हैं । जहां तक संस्कारों को बदलने की बात है तो हमारे देश में इसे यो आसानी से नही बदला जा सकता क्योकि अब तक तो संस्कारों को ही हमारे देश की अस्मिता और स्थिरता की निशानी माना जाता रहा है । ये जो रिलीजनस आउटलेट वर्तमान में नजर आ रहे है ये समाज में कब और कैसे शामिल हुये इसका तो मुझे ठीक से पता नही पर लोग बताते हैं कि हमारे देश में इसकी शुरूआत मुगलों ने अपने शासन काल में हिन्दुओं को जबरन मुसलमान बनाने से शुरू की । औरंगजेब के शासनकाल में तो इसकी पराकाष्ठा थी ऐसा इतिहास बताता है । गौर करें मुगलों के पास उस समय आज के प्रजातंत्र से कही बहुत जादा स्वतंत्रता थी ताकत भी बहुत थी पर उनके आने से लेकर अब तक करीब आठ सौ साल बीत गये दो सौ साल यदि अंग्रेजी हुकूमत के भी हटा दिये जाये तो चाहे मुगल शासित या अंग्रेजी शासित, इतिहास वर्णित इतनी जोर जबरदस्ती के बाद भी इतना लंबा अर्सा ली ये त्रासदी हिन्दुत्व को कितना कम कर पाई ? मुझे तो ऐसा नही लगता हां अलवत्ते हिन्दुओं के अपने खुद के धर्म में उनकी समर्पण वृत्ती दिन व दिन घटती जरूर नजर आती है पर वो एक अलग मुद्दा है और इसे किसी भी तरह धर्मपरिवर्तन से जोड़कर नहीं आका जा सकता ।
ज्ञान जब धर्म की पोर में पिरोया जाता है तो उसमें का कटा फटा सब सिलते चला जाता है…. यही हुआ इसमे, रूढि़वाद बिखरता चला गया दिन व दिन, और यही सनातन की विशेषता है क्योकि हद से जादा कठोरता लंबे समय तक बर्दास्त करना मनुष्यवृति में शामिल ही नहीं, इन्कार कर देता है वह इसे मानने से, सनातनी लचीलापन ही इसे टूटने नही देता तभी इतनी विपरीत परिस्थितियों के बाद भी इतना लंबा समय तय करते हुये आज तक सनातन अपना अस्तिित्व बचाते चला आ रहा है और यही लोच जिसे हम खुद आज इसकी कमजोरी बताकर पेश कर रहे है इस सनातन धर्म की पर्वत जैसी स्थिरता का कारण है ।

धर्म कोई दुकानों में बिकने बाला सामान नही जो आज इस ब्रांड़ का ले लिया कल दूसरे ब्रांड़ का ? पर ऐसा हो तो रहा है। हां इस एक्सचेंज आफर के दोनो तरफ की ईकाइयां अपनी धार्मिक निष्ठा और ईमानदारी को लेकर अब दिन बीतने के साथ स्वमेव कटहरे में खड़ी होती चली जा रही हैं ।
अपवाद रहित श्रृष्टि का श्रृजन तो हुआ ही नही क्योंकि हमारी दुनियां पूरे ब्रम्हांण में खुद एक अपवाद है ऐसे में किचित धार्मान्तरण को अपवाद न लेकर धर्मसंकट निरूपित करना राजनैतिक या समाजिक मुद्दा तो हो सकता है पर धर्मसंकट कभी नहीं ।
यदि आप ईश्वर को मानने वाले है तो यकीन रखिये धर्म कभी नही मरता क्योकि धर्म भौतिक न होकर एक आध्यात्मिक प्रवाह है ईश्वर जिसकी आत्मा है, हां स्वार्थबस धर्म को बचाने का प्रपंच जरूर किया जा सकता है । मैने बहुतो को इस पर्वत के हिलने का दाबा और फिर इसे बचाने का भ्रम पालते देखा है । भला ईश्वर जिसकी आत्मा है उसके प्राण कैसे हरे जा सकते हैं । ईश्वर कोई भी हो जब इस पर विश्वास है तो उसकी योग्यता पर संदेह क्यों ……

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