इन दिनों विचारों की अभिव्यक्ति में एक तूफान सा आया हुआ लगता है । प्रजातंत्र में अपने अपने विचारों को लोगों तक पहुचाने का सभी को हक है । विचारों को लोगो के सामने रखने रोज एक नया प्लेटफार्म सामने आ रहा है जाहिर सी बात है नित समझदार होती इस दुनियां में विचारों के इस आयात निर्यात से मचीं भगदड़ में बहुत कम समय में ही सही गलत, तुके बेतुके, अजीबो गरीब इतने ज्यादा विचारो का जमाबड़ा हो गया कि लोग विभ्रम की अवस्था तक पंहुच गये सीखे या छोड़ै हंसे या रोये आज लोग असमंजस की स्थिती में हैं सो विचार तो नही हां विचारों के प्रस्तुती के तरीके ही चर्चा का विषय बन गये ।
कभी युवाओं से चर्चा कीजिये वो आपको बतायेंगे एक लाईन से ज्यादा की इबारत को पढ़ने का समय नही है उनके पास, चित्रों सें ही बात हो जाती है, आजकल की युवा मानसिकता स्टेटस और चित्र प्रदर्शन पर ही खत्म हो जाती है शायद इसी कारण उन्हे ज्यादा आकर्षित करती फेसबुक सोसल नेटवर्किग साइट सबसे ज्यादा भीड़ भरी है। कालेज परिसर से निकल उन्ही के बीच में जवान हुआ यह प्लेटफार्म अंत में इन्ही यूथ को हड़पने मिला । एक ऐसा बहाव जो आज से लेकर कल तक में सब कुछ बहा ले जाता है इसमें आकर विचार तो गुम हो ही जाते है, हां इधर उधर अपनी शख्सियत तलासते सैकड़ों युवा जरूर नजर आते हैं पर भीड़ का वो रेला न तो विचारों को बचा पाता है और न ही शख्सियत को, चार पांच नौसिखिये भी एक साथ सुर मिलाकर कोरस को सुर में साध लेते हैं पर सौ, दोसौ पेशेवर गवैयो को एक साथ गाने कहा जाय, वो भी अपने अपने सुरों मे तो वो एक सुन्दर गीत तो नही हां एक घटना बनकर जरूर सामने आयेगा सो इस भीड़ में क्षणिक मौजूदगी दर्शाते इस प्लेटफार्म में विचारों के लिये कोई जगह नही है भले ही वर्ग विशेष को ये आनंददायी जरूर लगे पर "गुड माररररर्निग टू ऐवरीवडी ईट्स मी, फ्राम माई बाथरूम" जैसे श्लोगनों के साथ इसमें गम्भीरता के लिये कोई जगह नही, युवा ये समझे न समझे पर उम्रदराजों को ये समझ आ गया है सो इसमें प्रवेश से ज्यादातर अनुभवी कतराने लगे है।
यहां की नाउम्मीदगी ट्बीटर से पूरी हो इस आशय पर लोग बताते है कि हां यह बुद्धिजीवियों की मौजूदगी वाला ऐसा माध्यम है जहां विचारो को कुछ जगह मिल सकती है पर ट्बीटर का नजारा तो ज्यादा ही निराला है, प्रभुतावाद की धारणा लिये इस माध्यम में आपको बुद्धिजीवियों के चरणचिन्ह नजर आयेंगे जिनका अनुकरण करते हुये आप उन तक जायें उनकी प्रशंसा करे और वापिस आ जायें । आप जैसे साधारणों के विचार वहां पड़े तो रह सकते है पर उन पर नजर डालना इन सुपरलेटिव की शान के खिलाफ है । वैसे भी 160 अक्षरों में आप क्या विचार दे सकते है... हां विचारों के ऐसेट्स किसी साइट के रूप में आपके पास हो और उनको दम देती इतनी शख्सियत आप बना सकें तो आपको छूने की होड़ भी मच सकती है पर ऐसा हर एक के लिये संभव नही है । ट्बीटर की ये पगमार्क वंदना न सिर्फ आपके अंदर के लेखक को कुंठित करती है बल्कि हर क्लिक के साथ आपके लेखनी मनोबल को लगातार कमजोर करते चली जाती है सो हतासा देता यह सामंत वादी प्रसार माध्यम भी आपके लिये यही खत्म हो जाता है ।
हां ब्लाग एक ऐसा प्लेटफार्म है जहां कोई देखे न देखे, कम से कम आपके विचारों का अस्तित्व बना तो रहता है । यहां भी इग्लिश ब्लागरों को तो शकून है पर समस्याओ के साथ शुरू हुई हिन्दी ब्लागिग अभी तक शिशु अवस्था में ही है । ब्लागर्स तो बहुत है पर दर्शको में इसका जनाधार अब तक नही बन पाया है, शायद जितने ब्लागर्स है उनसे कुछ बीसे इक्कीस इसके विजिटरों की संख्या होगी। हिन्दी बोलना पढ़ना आजकल शान के खिलाफ हो चला है सो बदलते समय के इन प्रसार माध्यमों में बूढ़ी हो चली इस सीमित दर्शक दीर्घा के साथ इन चिटठो को कब तक प्राणवायु मिलती रहेगी इसका जबाव तो भविष्य की गर्त में है । इस पर प्रयास और वर्कआउट तो बहुत हो रहे हैं पर हिंदी ब्लागों का आकर्षण तो सीधा दिन व दिन कठिनाईया लिये सीमित होते हिंदी भाषा के प्रचार, प्रसार और प्रचलन पर ही आकर ठहरता है । प्रश्न यह नही है कि हिन्दी विचारकों के नाम गुम हो जायेंगे हां चिंता इस पर होती है कि भविष्य में हिंदी विचार ही कही गुम होकर न रह जायें ।

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