त्वरित बने रहने की ललक में क्या नही हो रहा हमारे देश में । मीड़िया, राजनीति और यहां तक कि आम लोगों की सोच में । अब केजरीवाल का बिजनेस क्लास में किया गया हवाई सफर सुर्खियों में है । माना की केजरीवाल के फैसले ज्यादातर हड़बड़ाये हुये होते है, इससे वे चर्चित भी हुये सफल भी और बाद में असफल, प्लेन में रायता क्या मांगा मीड़िया ने रायता ही बगरा दिया अरबिंद भाई की राजनीतिक सामाजिक और जाती जिंदगी का ।
ये सच है कि राजनीति में प्रवेश के बाद लोगों का व्यक्तिगत कुछ नही रह जाता पर मीड़िया या लोगों द्वारा किसी की व्यक्तिगत आजादी का इतना हनन उचित नही लगता । फंड़ कलेक्शन पर मचे इस बवाल ने उचित, अनुचित को दरकिनार कर निष्ठा को निशाना बनाया है पर किसी किसी निष्ठा का आकलन पारिस्थिक नही कालान्तर में निहित होता है ऐसा होते बहुत बार देखा गया है । राजनीति में अर्थ संकलन परम्परा सी बन गया है श्रोत भले ही पता न हो पर हरएक राजनैतिक पार्टी के पास पैसा आ रहा है यह सभी को मालूम है । फिर फंड जमा करने पर यह त्रियासदृष्य खीचातानी क्यो ? विचित्र स्थिती है, तरीकों पर मारा मारी चल रही है पर किसी भी एक दल को इस विषय में निर्विकार कहा जा सके ऐसा कुछ अब हमारे देश में बचा नही ।
इस पूरे प्रकरण में अरबिंद की ये दलील तो उचित लगती है कि आम आदमी तक की पहुच बिजनेस क्लास जैसी बन सके फिर उनकी यह बिजनिस क्लास यात्रा पर बवाल क्यो । तो क्या मीड़िया पर का यह समर सिर्फ हसलिये की ये मिथ बना रहे कि आम लोगो के हालात वैभवसाली वास्तविकता से परे है ? यदि इसका उत्तर ना लगता है तो आम लोगों को समर्पित इस विचार धारा से केजरीवाल का रेक्टीफिेशन क्यों, जहां दूसरे नेता हैलीकाप्टर हायर करते रहे हैं उस तुलना में बिजनिस क्लास में की केजरीवाल की यह हवाई यात्रा तर्कसंगत ही कही जा सकती है ।
रहा उनके अपने आम आदमी दर्शाने का उनका डिस्प्ले तो शायद दुनिया में एक भी ऐसा चरित्र नही मिलेगा जो लोगो के बीच आदर्सिता धारण कर पूरी जिंदगी उसे उसी रूप में निभा पाया हो तब सिर्फ अरबिंद से ही सारा राग द्वेष क्यों औरों को भी इस आर्तनाद में शामिल करना चाहिये.......

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