
पेशाबर के मिलिटी स्कूल में 16 /12 को आतंकवाद ने हर बार से हटकर शिशु नरसंहार को अंजाम दे इन्सानियत को फिर एक बार लाल कर डाला । तो शायद अब मुसलमानों का भी कुछ हटकर अलग तरीके से सोचने का बख्त आ चला है ? अपने आप को खुदाई खिदमतगार कह खुदा को भी नामंजूर इस खून खराबे को जेहाद बताने बाले इन चंद नाफरमानों ने मुसलमानी कोख को भी लाल कर दिया, अब तो मुसमलमानों कोे समझ आनी चाहियें की ये खिदमत की जेहादियत नही मनसूबों की जल्लादियत है ।
गैर मुस्लिमों में ये कहाबत चल पड़ी है ये सच है कि हर मुसलमान आतंकवादी नही है पर ये भी सच है कि हर आतंकवादी मुसलमान है । झुंड़ तो उन्हीका है और इसे दुनियां भर में इस्लाम की हिमायती मुहिम के रूप में पेश भी किया जा रहा है इससे भी इन्कार नही किया जा सकता। मैं गैर इस्लामी हूं पर मुझे भी बुरा लगता है मुट्ठी भर लोगों के पाप पूरों के सर मढ़ दिये जायें ? ऐसा क्यों हो रहा है इसका भी एक कारण है, गलत हो या सही ये सब इस्लाम के नाम पर हो रहा है इसे तो नकारा नही जा सकता अब यदि मुस्लिम बौद्धिकता इसे गलत मानती है तो फिर इनमें इस विचारधारा का पोषण तो नही कहा जा सकता पर दबे छिपे प्राश्रय या पनाह की मानसिकता क्यों, खुलकर इसका विरोध क्यों नहीं ? यदि ये बर्बरता इस्लाम के विपरीत है तो इसके विरोध में तो मुसलमानों को ही सामने आना होगा । पर ऐसा हो नहीं रहा है, पूर्वाग्रह या भय ऐसे दो कारण दिखाई पड़ते हैं जिसके कारण इस बर्बरता के विराध में ज्यादातर मुसलमान मुखर होकर सामने नहीं आ पा रहे हैं ।
कारण जो भी हो उन्हें ही अपनों को ये समझाना होगा कि ये खुदाई खिदमत तो कहीं से नजर नही आती । ताज्जुब है कितनी आसानी से दहशतगर्द उन्हें ये समझा देते है कि अल्लाह की खिदमत में की गई इस जेहाद और उससे हुई नुकसानी को अल्लाह की राह में दी कुर्बानी समझ इसे बेखौप अंजाम दें ! इससे सब किया धरा माफ ही नहीं होगा ये बंदे को जन्नत भी नसीब करायेगा । कितनी गलत फिलासफी है ये जिंदगी के बाद की उस अंजान दुनियां में जन्नत पाने, इस ओर की जन्नत जैसी जानी पहचानी दुनियां को जहन्नुम बनाना .... इस बर्बरता को कुर्बानी करार देते हैं ये पर जहां तक मुझे पता है कुर्बानी उसी की दी जा सकती है जिस पर उनका हक हो ? तो सारी दुनियां भर के लोगों पर इन मुट्ठी भर लोगों को किसने हक दे दिया ये भी समझ से परे है। इस्लाम की इन साधारण बातों को भी कितने गलत तरीके से इस्लामियों को ही समझा दिया जाता हैं, ताज्जुब होता है यह देखकर ।
गैर मुसलमान इस पर चर्चा तो जरूर करता है पर क्या फर्क पड़ता है इससे हां यदि इस पर मुस्लिम समाज में चर्चा हो, इस्लाम की बातें इस्लामी ही अपने लोगों में कहें तो जरूर फर्क पडे़गा । सिर्फ और सिर्फ मुसलमान ही इसका विरोध कर समझा सकता है अपनों को, क्योकि इसका हल ही मुस्लिम विचार धारा के सही बहाव पर टिका है। आवाज तो उठती देखी है इस पर, पर सिर्फ मुस्लिम राजनैतिक मुखैटों से । इसका निदान यदि चाहिये तो उनके हर घर के खप्पर से इसके विरोध में आवाज उठनी चाहिये...... इस्लाम में इन्सानियत को बहुत उंचा दर्जा दिया गया है पर किताब के बाहर इस छबि को कौन दागदार कर रहा है, अब हर स्तर के मुस्लिम वर्ग को इसे समझ जाना चाहिये, समझाते जाना चाहिये....
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